संदेश

द्वादश भावों से विचारणीय विषय

चित्र
 ज्योतिष शास्त्र के अनुसार १२ भावों से विचारणीय विषय, प्रथम व द्वितीय भाव में ग्रहों का फल तथा प्रमुख ज्योतिषीय योगों का शुद्ध व व्यवस्थित विवरण निम्नलिखित है: १. द्वादश भावों से विचारणीय विषय (१२ भाव प्रथम भाव लग्न :- विचारणीय मुख्य विषय व अंग शारीरिक बनावट (रूप, रंग, कद), स्वभाव (शांत/क्रोधी), आरोग्यता, अहंकार, आत्मा, बाल्य/यौवन अवस्था, प्रवास, संपत्ति व सुख-दुःख। द्वितीय भाव :- धन/कुटुंब धन-धान्य, स्वोपार्जित व पैतृक धन, रत्न-धातु (सोना, चांदी, मोती), वाणी, चेहरा, दाहिनी आंख, विद्या, परिवार, मित्र-शत्रु, मामा-मौसी व मृत्यु (मारक)। तृतीय भाव :- सहज/पराक्रम छोटे भाई-बहन, पराक्रम, साहस, दुष्ट बुद्धि, आजीविका, छोटी यात्राएं, भुजा, हाथ, कण्ठ, दाहिना कान व स्वर। चतुर्थ भाव :- सुख/मातृ माता, मकान, वाहन, भूमि, गड़ा धन, कृषि, इष्ट-मित्र, ससुर, हृदय, छाती, पेट, विद्या, सुख-दुःख व मानसिक शांति। पंचम भाव:- पुत्र/बुद्धि संतान, गर्भ-स्थिति, बुद्धि, स्मरण शक्ति, नीति, परामर्श, गुप्त मंत्र-तंत्र सिद्धि, लॉटरी/सट्टा, वाक्पटुता, हृदय व पीठ। षष्ठ भाव:- रिपु/रोग शत्रु, रोग, ऋण (कर्ज), मानसिक चिंता,...

भावफल विचार

चित्र
  वैदिक ज्योतिष में प्रथम भाव (लग्न) का महत्व और 'भावफल विचार' लेखक: ज्योतिषाचार्य: पंडित हेमवती नन्दन कुकरेती  वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली के बारह भावों में प्रथम भाव यानी लग्न को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। यह भाव देह, आरोग्य, रूप, स्वभाव और जातक के संपूर्ण जीवन का आधार है। यदि लग्न बलवान हो, तो कुंडली के अनेक दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं। लग्न भाव: समस्त सुखों और कर्मों का आश्रय जन्मकुंडली के सभी शुभाशुभ फलों का भोग शरीर के माध्यम से ही संभव है, इसीलिए प्रथम भाव को फलाश्रय एवं कर्माश्रय कहा जाता है। जिस प्रकार किसी टूटे या फूटे हुए बर्तन में पानी नहीं टिक सकता, उसी प्रकार लग्न के निर्बल होने पर कुंडली के बड़े-बड़े राजयोग और धनयोग भी अपना प्रभाव खो देते हैं। > भावा द्वादश तत्र सौख्यशरणं देहं मतं देहिनां, > तस्मादेव शुभाशुभाख्यफलजः कार्यों बुधैर्निर्णयः॥ >  अर्थ: बारह भावों में देह (शरीर) ही प्राणियों के समस्त सुखों का आश्रय है। इसलिए विद्वानों को शुभ और अशुभ फलों का निर्णय मुख्य रूप से लग्न और देह के बल का विचार करके ही करना चाहिए। शारीरिक सौख्य और आरोग्य...

द्वादश भावों से विचारणीय विषय

चित्र
  द्वादश भावों से विचारणीय विषय ​लग्नादि भावों से किन-किन बातों का विचार होता है? ​1.लग्न – शरीर सम्बन्धी सब विचार होता है। शारीरिक पुष्टता, दुर्बलता, शरीर का रूप, रंग, शरीर का छोटा बड़ा होना, स्वभाव (शान्ति प्रिय, क्रोधी), अहंकार, अज्ञान, निन्दा, आयु प्रमाण, सुख-दुःख, आत्मा, आरोग्यता, बालयौवनादि अवस्था, स्थान प्रवास, सम्पत्ति आदि का विचार प्रथम भाव से किया जाता है। ​2.द्वितीय भाव – धन-धान्य का विचार, वस्तुओं का क्रय-विक्रय, सुवर्ण, चाँदी धातु आदि मोती, मूँगा, माणिक आदि रत्न विचार, स्वोपार्जित व पितृ सम्बन्धी धन का विचार, भोजन, पात्र, वस्त्र, मुख, जीभ, चेहरा, दाहिनी आँख, वाणी, विद्या, शिक्षा, परिवार, कुटुम्ब, मित्र, शत्रु, मामा, मौसी, नौकर-चाकर और मृत्यु का विचार होता है। शरीर के अंगों में मुख, गला, कण्ठ, गर्दन और नेत्र का विचार होता है। ​3.तृतीय भाव – छोटे भाई-बहिन, नौकर, चाचा, ताऊ, सगे-संबंधी, पराक्रम, साहस, दुष्ट बुद्धि, आजीविका, व्यापार-उद्यम, मार्ग चलना, लघुवाहन से यात्रा का विचार, भुजा, हाथ, कण्ठ, दक्षिण कर्ण, स्वर, वस्त्र आदि का विचार सहज भाव से किया जाता है। ​4.चतुर्थ भाव –...

"वैदिक एस्ट्रो-डायग्नोस्टिक्स: प्राचीन सूत्रों से आधुनिक NICU (नवजात आईसीयू) प्रबंधन तक"

चित्र
  शोधपरक लेख: वैदिक एस्ट्रो-डायग्नोस्टिक्स: प्राचीन सूत्रों से आधुनिक NICU (नवजात आईसीयू) प्रबंधन तक" वराहमिहिर कृत 'बृहज्जातकम्' के अरिष्टाध्याय का यह १७वां श्लोक और १८वें श्लोक का पूर्वार्ध केवल फलित ज्योतिष के सूत्र नहीं हैं, बल्कि यह प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों के खगोलीय वेध (Astronomical Observation) और मानव जीवविज्ञान (Human Biology/Neonatal Healthcare) के अंतर्संबंधों का एक गहरा शोधपरक दस्तावेज़ है। शोधपरक (Analytical & Research-oriented) दृष्टिकोण से इस पाठ का सटीक वैज्ञानिक, गणितीय और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण नीचे दिए गए मुख्य बिंदुओं के आधार पर किया जा रहा है। 1. खगोलीय एवं प्रकाश-मितीय विश्लेषण (Astronomical & Photometric Analysis) श्लोक की पहली ही शर्त है—"लग्ने क्षीणे शशिनि" (लग्न में क्षीण चन्द्रमा)। • प्रकाश का प्रभाव (Luminosity Phase): 'क्षीण चन्द्रमा' का अर्थ है कृष्णपक्ष की एकादशी से शुक्लपक्ष की पंचमी तक का चंद्रमा, जिसमें सूर्य के निकट होने के कारण उसका प्रकाश न्यूनतम या शून्य (अमावस्या) होता है। शोधपरक दृष्टि से, पृथ्वी पर पड़ने व...

Guru ka mahagochar ap ke kitana shubh kitana ashubh?

 🔮 बड़ा राशि परिवर्तन: देवगुरु बृहस्पति का कर्क राशि में गोचर! 🔮 जय श्री कृष्ण! 🙏 ज्योतिष जगत में एक बहुत बड़ा और शुभ परिवर्तन होने जा रहा है। 2 जून 2026 से ज्ञान, भाग्य, और संतान के कारक देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर अपनी उच्च राशि कर्क (Cancer) में प्रवेश करने जा रहे हैं। गुरु का अपनी उच्च राशि में आना ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगा। वैसे तो यह गोचर सभी राशियों पर प्रभाव डालेगा, लेकिन 4 विशेष राशियां ऐसी हैं जिनकी किस्मत का ताला इस गोचर से खुलने जा रहा है! ✨ इन 4 राशियों पर बरसेगी गुरु की विशेष कृपा: • कर्क राशि (Cancer): आपकी ही राशि में गुरु का आगमन हो रहा है। मान-सम्मान में वृद्धि, निर्णय क्षमता में सुधार और अटके हुए काम पूरे होंगे। • वृश्चिक राशि (Scorpio): भाग्य का भरपूर साथ मिलेगा। आध्यात्मिक यात्राओं के योग बनेंगे और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिल सकती है। • मीन राशि (Pisces): संतान सुख, प्रेम संबंधों में मधुरता और आकस्मिक धन लाभ के योग बनेंगे। विद्यार्थियों के लिए यह समय वरदान सिद्ध होगा। • कन्या राशि (Virgo): आय के नए स्रोत बनेंगे, लंब...

किस राशि वालों के लिए, कैसा रहेगा जून का महीना: जानिए ज्योतिषाचार्य पंडित हेमवती नन्दन कुकरेती से

  जून 2026: सभी 12 राशियों का सटीक मासिक गोचर फल एवं अचूक उपाय नमस्कार पाठकों! जून 2026 का यह महीना ग्रहों की चाल के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण और बदलावों से भरा रहने वाला है। " Hemnastro " के आधार पर इस महीने ग्रहों की स्थिति का सूक्ष्म आकलन किया गया है। इस महीने सूर्य, मंगल, बुध और शुक्र का राशि परिवर्तन सभी 12 राशियों के जीवन के विभिन्न आयामों जैसे—करियर, वित्त, स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन को गहराई से प्रभावित करेगा। आइए जानते हैं ज्योतिषाचार्य: पंडित हेमवती नन्दन कुकरेती के अनुसार आपकी राशि के लिए जून 2026 कैसा रहने वाला है। 1. मेष राशि (Aries) • गोचर फल: जून का महीना आपके साहस और पराक्रम में वृद्धि करेगा। फलदीपिका के अनुसार, तृतीय भाव में सूर्य और बुध का प्रभाव आपको कार्यक्षेत्र में बड़ी सफलता दिलाएगा। व्यापार में नए सौदे लाभ देंगे। हालांकि, गोचर के उत्तरार्ध में राहु-मंगल की स्थिति के कारण वाणी में उग्रता आ सकती है, जिससे बचें। • उपाय: प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और मंगलवार को लाल मसूर की दाल का दान करें। 2. वृषभ राशि (Taurus) • गोचर फल:जातक चिंतामणि के सिद्धांत ब...

"ज्योतिष: अंधविश्वास या आधुनिक विज्ञान? एक तार्किक विश्लेषण"

चित्र
 आज के आधुनिक और तार्किक युग में, जब हम हर चीज को 'डाटा' और 'प्रमाण' की कसौटी पर कसते हैं, तो अक्सर एक प्रश्न उठता है: "क्या ज्योतिष वैज्ञानिक है?" कुछ लोग इसे मात्र अंधविश्वास मानकर नकार देते हैं, तो कुछ इसे केवल संयोग कहते हैं। लेकिन एक ज्योतिषीय शोधकर्ता के रूप में, मैं इसे 'समय का विज्ञान' (Science of Time) और 'ऊर्जा का गणित' मानता हूँ। ​इस लेख के माध्यम से, मैं ज्योतिष की प्रामाणिकता को सिद्ध करने वाले कुछ ऐसे सूत्र साझा कर रहा हूँ जो विज्ञान और तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं। ​1. खगोल विज्ञान और ज्योतिष का अटूट संबंध ​प्राचीन काल में 'एस्ट्रोनॉमी' (खगोल विज्ञान) और 'एस्ट्रोलॉजी' (ज्योतिष) एक ही सिक्के के दो पहलू थे। ज्योतिष की नींव शुद्ध गणित पर टिकी है। ग्रहों की गति, उनकी डिग्री, अक्षांश और देशांतर (Latitude & Longitude) की गणना इतनी सटीक होती है कि नासा (NASA) के आधुनिक उपकरण भी उन्हीं परिणामों पर पहुँचते हैं जो हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले 'सूर्य सिद्धांत' जैसे ग्रंथों में लिख दिए थे। ​2. कॉस्मोबायोलॉजी ...

भारत में पंचाग निर्माण की परंपरा

चित्र
      पंचाग परिचय:-   भारतीय ज्योतिषशास्त्र का मूलाधार आकाशीय ग्रहनक्षत्रों का गणित तथा वेध है। गणित के आधार पर सूर्य चन्द्रादि की स्थितियों का सही निर्णय कर गोलीयवेध से दृग्गणितैक्यजन्य समन्वय के द्वारा ग्रहों की वास्तविक दृष्टयुपलब्ध स्थिति ही, उनकी व्यवहारिक उपयोगिता का मूल आधार है। पर्व, धर्मकार्य, यात्रा, विवाह, उत्सव जातक तथा भविष्यफल की जानकारी हेतु ग्रहगणित की शुद्धता की परख पंचांगनिर्माण के द्वारा ही सिद्ध होता है। पंचानां अंगानां समाहारः इति पंचांगम्। पंचांग में पाँच अंग प्रधान होते है तिथि, वार, नक्षत्र, योग एवं करण। इन पाँच अंगों के समाहार को पंचांग कहते है। यथा - तिथिवारं च नक्षत्रं योगः करणमेव च।         इति पंचांगमाख्यातं व्रतपर्वनिदर्शकम्।।  ये सभी व्यक्तकाल के प्रधान तत्व है। इनके ही आधार पर प्रत्येक धार्मिक, सामाजिक, व्यावहारिक एवं शास्त्रीयकार्य सम्पन्न होते हैं। 'पंचांग' ज्योतिषशास्त्र का मेरूदण्ड माना जाता है। शककाल, वर्षारम्भ, संवत्सर, पूर्णिमान्त- अमान्त मान इत्यादि कुछ बातें पंचांग की ही अंगभूत है। विदित है कि ज्योतिषग...

विवाह: मुहूर्त

चित्र
  हिंदू धर्म में विवाह के लिए शुभ समय (मुहूर्त) का निर्धारण ज्योतिषीय गणनाओं, ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, तिथि, लग्न, और योग पर आधारित होता है। विभिन्न मुहूर्त ग्रंथों, जैसे *मुहूर्त चिंतामणि*, *धर्मसिंधु*, और *पंचांग*, के अनुसार विवाह का समय दिन या रात दोनों में शुभ हो सकता है, बशर्ते शुभ मुहूर्त और लग्न की गणना सही हो। नीचे इस विषय पर विस्तृत जानकारी दी गई है:        मुहूर्त शास्त्रों के अनुसार भाद्रादि आदि अन्य क्रूर दोषरहित विवाह - नक्षत्र के समय शुद्ध लग्न में विवाह कभी भी (रात्रि या दिन में) किया जा सकता है। इस विषय में जाति का कोई बंधन नहीं है। लेकिन मुहूर्तशास्त्रकारों ने परामर्श किया है कि विवाह रात्रि के समय किया जाए तो अपेक्षाकृत अधिक शुभ होता है क्योंकि यमघंट, यमदष्ट्रा, क्रकच आदि अनेक अशुभ योगों का प्रभाव दिन में ही होता है, रात्रि में नहीं - "दिवा मृत्युप्रदा: दोषास्त्वेषु न रात्रिषु "-(वशिष्ट:)  1. दिन में विवाह शास्त्रीय दृष्टिकोण: हिंदू शास्त्रों में सामान्यतः शुभ कार्यों को दिन में करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि सूर्य की उपस्थिति को सकारात...

कर्क में शुक्र का गोचर: इन राशियों के लिए विशेष फलदायी।

चित्र
20 अगस्त 2025 को शुक्र ग्रह मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में गोचर करेंगे। यह गोचर लगभग एक महीने तक रहेगा, जिसका विभिन्न राशियों पर अलग-अलग प्रभाव देखने को मिलेगा। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, सौंदर्य, विलासिता, धन और संबंधों का कारक माना जाता है, जबकि कर्क राशि भावना, परिवार और घर से जुड़ी होती है। इसलिए, इस गोचर के दौरान लोगों के भावनात्मक जीवन, पारिवारिक संबंधों और वित्तीय मामलों पर विशेष प्रभाव पड़ सकता है। शुक्र गोचर का विभिन्न राशियों पर प्रभाव: मेष राशि: यह गोचर आपकी राशि के चौथे भाव में होगा, जो घर और परिवार से संबंधित है। इस दौरान आप घर की सजावट या मरम्मत पर खर्च कर सकते हैं। पारिवारिक रिश्तों में मधुरता आएगी और आप परिवार के साथ अधिक समय बिताएंगे। वृषभ राशि: शुक्र आपकी राशि के तीसरे भाव में गोचर करेंगे, जिससे आपके बातचीत करने के तरीके में सुधार होगा। यह आपके लिए नए वित्तीय अवसर ला सकता है। आप भाई-बहनों या दोस्तों के साथ छोटी यात्राओं की योजना बना सकते हैं, जिससे रिश्ते मजबूत होंगे। मिथुन राशि: शुक्र आपकी राशि के दूसरे भाव में गोचर करेंगे, जो धन और वाणी का भाव...

सिंह राशि में सूर्य का गोचर: इन राशियों के लिए विशेष फलदायक।

चित्र
सूर्य का अपनी ही राशि सिंह में गोचर एक महत्वपूर्ण ज्योतिषीय घटना है। इसे ज्योतिष में बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि सूर्य अपनी स्वराशि में होने के कारण अधिक बलवान और प्रभावशाली हो जाते हैं। इस गोचर का प्रभाव सभी राशियों पर पड़ता है, लेकिन कुछ राशियों के लिए यह विशेष रूप से फलदायी होता है। आइए जानते हैं किन राशियों के लिए यह गोचर विशेष रूप से लाभकारी सिद्ध होगा:  * मिथुन राशि: मिथुन राशि के जातकों के लिए सूर्य का यह गोचर बेहद शुभ माना जाता है। इस दौरान आपको व्यापार में उन्नति मिल सकती है, नौकरी से जुड़ी परेशानियां दूर होंगी और आय के नए स्रोत बन सकते हैं। छात्रों को भी परीक्षा में सफलता मिलने की संभावना है।  * सिंह राशि: सूर्य आपकी ही राशि में गोचर कर रहे हैं, इसलिए यह समय आपके लिए बहुत अच्छा रहेगा। आपकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी और नौकरी में बदलाव के अवसर मिल सकते हैं। इस दौरान आपके रुके हुए काम भी पूरे होने की संभावना है।  * धनु राशि: धनु राशि के जातकों के लिए सूर्य का सिंह राशि में गोचर बेहद शुभ साबित होगा। आपको विदेश यात्रा का अवसर मिल सकता है, जो आपके करियर ...

ग्रह शांति में नव ग्रह समीदा का उपयोग

चित्र
  नव ग्रह समीदा हवन में उपयोग की जाने वाली नौ विभिन्न प्रकार की लकड़ियों या पौधों की टहनियों का एक समूह है, जो नौ ग्रहों में से प्रत्येक का प्रतिनिधित्व करती हैं।" नमस्ते! "नव ग्रह समीदा" हवन (अग्नि अनुष्ठान) में उपयोग की जाने वाली नौ अलग-अलग प्रकार की लकड़ियों या पौधों की टहनियों का एक समूह है, जो नौ ग्रहों में से प्रत्येक का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन समिधाओं का उपयोग नवग्रहों को प्रसन्न करने और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। प्रत्येक ग्रह के लिए विशिष्ट समीदा निर्धारित है:  * सूर्य: अर्क (आक)  * चंद्र: पलाश (ढाक)  * मंगल: खदिर (कत्था)  * बुध: अपामार्ग (चिरचिटा)  * बृहस्पति: पीपल  * शुक्र: उदुम्बर (गूलर)  * शनि: शमी (खेजड़ी)  * राहु: दूर्वा (दूब घास)  * केतु: कुशा (दर्भ घास) हवन करते समय, प्रत्येक ग्रह के मंत्र का जाप करते हुए उसकी संबंधित समीदा को अग्नि में अर्पित किया जाता है। नव ग्रह समीदा का महत्व:  * माना जाता है कि प्रत्येक समीदा में उस विशेष ग्रह की ऊर्जा होती है।  * हवन में इन समिधाओं का उपयोग करके, व्...

बिखोति संक्रांति

बिखोति संक्रांति मुख्य रूप से उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इसे विषुवत संक्रांति या मेष संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है, और यह बैसाख महीने के पहले दिन पड़ता है, जो आमतौर पर अप्रैल के मध्य में होता है। 14 अप्रैल 2025 को भी बिखोति संक्रांति मनाई जाएगी। बिखोति संक्रांति का अर्थ और महत्व:  * यह त्योहार हिंदू सौर नववर्ष की शुरुआत का प्रतीक है।  * यह वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल के मौसम की शुरुआत का भी प्रतीक है।  * 'बिखोति' शब्द वन्यजीवों से जुड़ा हुआ माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इस दिन बारिश होने से पौधे बीमारियों से मुक्त रहते हैं और अगली फसल अच्छी होती है।  * यह दिन गंगा नदी और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने और दान-पुण्य करने के लिए शुभ माना जाता है।  * यह त्योहार उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को दर्शाता है। बिखोति संक्रांति की परंपराएं और अनुष्ठान:  * पवित्र स्नान: लोग नदियों और पवित्र कुंडों में स्नान करते हैं।  * पूजा और दान: मंदिरों में पूजा-अर्चना की जाती है और गरीबों को दान दिया जाता है।  * ओढ़ा ...

हिंदू कैलेंडर का वैज्ञानिक आधार और वर्तमान कैलेंडर

चित्र
 #हिन्दू_कैलेंडर की #वैज्ञानिकता का आधार  आज वर्तमान में  संपूर्ण विश्व में ग्रेगोरियन कैलेंडर का उपयोग किया जाता है जो सूर्य के उदय अस्त पर आधारित है।  *ग्रेगोरियन कैलेंडर को 1582 में पोप ग्रेगरी XIII द्वारा शुरू किया गया था।    * यह जूलियन कैलेंडर का एक संशोधन था, जो पहले उपयोग में था, लेकिन बहुत सटीक नहीं था। *हिंदू कैलेंडर की वैज्ञानिकता खगोल विज्ञान और गणित पर आधारित है। यहां कुछ प्रमुख पहलू दिए गए हैं:  * चंद्र और सौर गणना:    * हिंदू कैलेंडर चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। यह इसे अन्य कैलेंडरों से अधिक सटीक बनाता है, जो केवल चंद्रमा या सूर्य पर आधारित होते हैं।    * चंद्रमा की गति के आधार पर महीनों की गणना होती है, जबकि सूर्य के आधार पर साल की गणना होती है।  * नक्षत्रों का उपयोग:    * हिंदू कैलेंडर में नक्षत्रों का भी उपयोग किया जाता है, जो तारों के समूह हैं।    * नक्षत्रों की स्थिति का उपयोग शुभ और अशुभ समय निर्धारित करने के लिए किया जाता है।  * गणितीय सटीकता:    * हिंदू कै...

Karmesh bhav fal: कर्म भाव फल

चित्र
 हमारे जीवन में कर्म का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान है। बिना कर्म के कोई भी कार्य की प्राप्ति असंभव सी है। ईश्वर का यह शाश्वत नियम है कि जैसे कर्म करेगें वैसे फल की प्राप्ति होगी। यह वाक्य वेद,पुराण आदि ग्रन्थों वर्णित है। इस जगत में सभी चराचर जीव-जन्तु,प्राणि,मनुष्य कर्म के अधीन है। ज्योतिषशास्त्र में कर्मफल का विवेचन किया गया है। पूर्व जन्मकृत के आधार पर मनुष्य इस जन्म उचित-अनुचित कर्म करता है। जन्माङ्ङ्ग चक्र में दशवें भाव को कर्म भाव माना गया है तथा इस भाव के स्वामी को कर्मेश कह गया है। दशम भाव के स्वामी की विभिान्न भावों के साथ योग, दृष्टि व संबंध से व्यक्ति के कर्म क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है। इस लेख में आप विस्तार से जान पाएँगे कि कर्म व कर्मेश की भूमिका।  *कर्मेश अर्थात दशम भाव का स्वामी यदि लग्न में स्थित हो तो ऐसा व्यक्ति कविता करने वाला, बाल्यकाल में रोगी पीछे सुखी और प्रतिदिन धन में वृद्धि करने वाला होता है। * यदि कर्मेश 2,3,7 भावों में हो तो व्यक्ति मनस्वी, गुणी, बुद्धिमान और सत्य बोलने वाला होता है।  *यदि कर्मेश चौथे व दशम भाव में हो तो व्यक्ति, ज्ञानी, सुखी, वि...

वृश्चिक लग्न और वृश्चिक वर्षफल: एक गहन विश्लेषण

चित्र
  वृश्चिक लग्न और वृश्चिक वर्षफल: एक गहन विश्लेषण           जब जन्म लग्न और वर्षफल दोनों ही वृश्चिक राशि के हों, तो जातक की कुंडली में एक अद्वितीय संयोजन बनता है। यह संयोजन जातक के व्यक्तित्व और जीवन में कई महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है। वृश्चिक राशि अपने आप में एक तीव्र, भावुक और रहस्यमय राशि है। जब यह लग्न और वर्षफल दोनों में हो, तो जातक के भीतर इन गुणों की तीव्रता और भी बढ़ जाती है। ऐसे जातकों के सामान्य लक्षण:  * गहन भावनाएं: वे अपनी भावनाओं को बहुत गहराई से अनुभव करते हैं। प्रेम, घृणा, ईर्ष्या जैसी भावनाएं उनके जीवन में एक प्रमुख भूमिका निभाती हैं।  * रहस्यमय स्वभाव: वे अक्सर अपनी भावनाओं को दूसरों से छिपाते हैं और एक रहस्यमयी आभा रखते हैं।  * मजबूत इच्छाशक्ति: वे अपनी मनचाही चीजें पाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं और कभी हार नहीं मानते।  * अंतर्दृष्टि: उनके पास दूसरों को गहराई से समझने की अद्भुत क्षमता होती है।  * चुंबकीय व्यक्तित्व: वे अपने चारों ओर लोगों को आकर्षित करते हैं। वर्षफल में वृश्चिक लग्न होने का प्रभाव:  * परिवर्त...

जीवन के चार पुरुषार्थ

चित्र
  जीवन के चार उद्देश्य वैदिक विज्ञान मानव जीवन के चार उद्देश्यों या लक्ष्यों को पहचानता है: काम, अर्थ, धर्म और मोक्ष।  1.#काम का अर्थ है इच्छा और यह जीवन में भावनात्मक और संवेदी पूर्ति की हमारी आवश्यकता को दर्शाता है। इस प्रकार, हम इसे आनंद कह सकते हैं। जीवन में हम जो कुछ भी करते हैं, वह खुशी का स्रोत होना चाहिए और किसी भी प्राणी को पीड़ा नहीं पहुँचाना चाहिए। 2.#अर्थ- का अर्थ है लक्ष्यों की प्राप्ति, लेकिन यह विशेष रूप से मूल्यवान वस्तुओं के अधिग्रहण से संबंधित है और इसलिए इसे धन के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। हममें से प्रत्येक के पास जीवन में अपनी क्षमता को पूरा करने के लिए धन की आवश्यक वस्तुएँ होनी चाहिए। 3.#धर्म- का अर्थ है सिद्धांत या कानून और यह सम्मान या मान्यता की हमारी आवश्यकता को दर्शाता है। हम इसे व्यवसाय कह सकते हैं, क्योंकि हमारी संस्कृति इस आवश्यकता की व्याख्या इसी तरह करती है। हममें से प्रत्येक को इस बात के लिए स्वीकार किए जाने की आवश्यकता है कि हम क्या कर सकते हैं ताकि हम अपने वास्तविक स्वरूप से समझौता किए बिना समाज में योगदान दे सकें। 4.#मोक्ष का अर्थ है ...

हिन्दू धर्म में नारायणबली का का करण एंव महत्व

चित्र
              नारायणबलि      सनातन (हिन्दू) धर्म विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है. यह धर्म प्रकृतिमूलक के साथ - साथ ईश्वरवादी भी है.  इस धर्म में ईश्वर, आत्मा तथा जीव में समन्वय स्थापित किया गया है. इसी लिए शास्त्रों में कहा गया है कि- "देवाधीनं जगत सर्वम, मंत्राधिनम च देवता"।।    हमारे धर्म शास्त्रों में मृत्यु का प्रकार,  मृत्यु का कारण तथा उसकी प्रकृति पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है, और मृत्यु की गति के अनुसार व्यक्ति को इहलोक एवं परलोक की प्राप्ति होती है। जिन व्यक्तियों की आकस्मिक मृत्यु होती है तथा मृत्यु का कोई कारण पता नहीं चलता है और उनकी मृत आत्माएं इस लोक में मुक्ति के लिए भटकती रहती है. मृतात्मा की शांति के लिए नारायणबलि का प्रावधान बताया गया है, जो इस प्रकार है -    ग्यारहवें दिन से समन्त्रक श्राद्ध आदि करने की विधि है। प्राणी के दुर्मरण की निवृत्ति के लिये नारायणबलि करने की आवश्यकता होती है। दुर्मरण की आशंका न रहने पर नारायणबलि करना अनिवार्य नहीं है। शास्त्रों में दुर्भरण के निम्नलिखित कारण परिभ...

Grahchar fal ग्रहचार : भौमाचार फल

चित्र
 ग्रहचार : भौमाचार फल (ज्योतिषाचार्य पं. हेमवती नंदन कुकरेती) ग्रहचार : सामान्य परिचय ज्योतिष शास्त्र में ग्रहचार का अर्थ है ग्रहों का चलन। 'चर' शब्द चलन अर्थ में प्रयुक्त होता है। सूर्यादि ग्रहों का चार एवं चारफल का वर्णन समस्त संहिताचार्यों ने अपने-अपने ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। आइए मंगल के चार से आरम्भ करते है - अपने उदय नक्षत्र से सातवें, आठवें तथा नवें नक्षत्र में यदि मंगल वक्री हो तो उसे उष्णसंज्ञक कहते हैं। इसमें अग्नि भय होता है तथा प्रजा पीडित होती है। यदि मंगल दसवें, ग्यारहवें या बारहवें नक्षत्र में वक्री हो तो अल्प सुख एवं वर्षा होती है। कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे। व्यालाख्यवक्रं तत्तस्मिन् सस्यवृद्धिरहेर्भयम्।। यदि उदय नक्षत्र से तेरहवें या चौदहवें नक्षत्र में मंगल वक्री हो तो इसे व्याल नामक वक्र कहते हैं। इसमें धान्य की वृद्धि होती है तथा सर्पभय होता है। पंचदशे षोडशक्षै तद्वक्रं रूधिराननं। सुभिक्षकृत्भयं रोगान्करोति यदि भूमिजः ।। यदि १५ वें या १६ वें नक्षत्र पर मंगल ग्रह वक्री हो तो इसे रूधिरानन वक्र कहते हैं। इसमें सुभिक्ष होता है तथा भय एवं रो...