Grahchar fal ग्रहचार : भौमाचार फल

 ग्रहचार : भौमाचार फल



(ज्योतिषाचार्य पं. हेमवती नंदन कुकरेती)


ग्रहचार : सामान्य परिचय


ज्योतिष शास्त्र में ग्रहचार का अर्थ है ग्रहों का चलन। 'चर' शब्द चलन अर्थ में प्रयुक्त होता है। सूर्यादि ग्रहों का चार एवं चारफल का वर्णन समस्त संहिताचार्यों ने अपने-अपने ग्रन्थों में प्रतिपादित किया है। आइए मंगल के चार से आरम्भ करते है -


अपने उदय नक्षत्र से सातवें, आठवें तथा नवें नक्षत्र में यदि मंगल वक्री हो तो उसे उष्णसंज्ञक कहते हैं। इसमें अग्नि भय होता है तथा प्रजा पीडित होती है।

यदि मंगल दसवें, ग्यारहवें या बारहवें नक्षत्र में वक्री हो तो अल्प सुख एवं वर्षा होती है।


कुजे त्रयोदशे ऋक्षे वक्रिते वा चतुर्दशे।

व्यालाख्यवक्रं तत्तस्मिन् सस्यवृद्धिरहेर्भयम्।।


यदि उदय नक्षत्र से तेरहवें या चौदहवें नक्षत्र में मंगल वक्री हो तो इसे व्याल नामक वक्र कहते हैं। इसमें धान्य की वृद्धि होती है तथा सर्पभय होता है।


पंचदशे षोडशक्षै तद्वक्रं रूधिराननं।


सुभिक्षकृत्भयं रोगान्करोति यदि भूमिजः ।।


यदि १५ वें या १६ वें नक्षत्र पर मंगल ग्रह वक्री हो तो इसे रूधिरानन वक्र कहते हैं। इसमें सुभिक्ष होता है तथा भय एवं रोग होता है।


अष्टादशे सप्तदशे तदासिमुसलं स्मृतम्।

दस्युभिर्धनहान्यादि तस्मिन्भौमे प्रतीपगे।।


१८ वें १७ वें नक्षत्र में मंगल वक्री हो तो इसे असिमुसल नामक वक्र कहते हैं। इसमें चोरों से तथा डाकुओं से धन की हानि होती है।


फाल्गुन्योरूदितो भौमो वैश्वदेवे प्रतीपगः ।

अस्तगश्चतुरास्यक्षे लोकत्रयविनाशकृत्।।


यदि मंगल पूर्वाफाल्गुनी या उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में उदय होकर उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में वक्री हो और पुनः रोहिणी में अस्त हो जाय तो तीनों लोकों का नाश करने वाला होता है।


उदितः श्रवणे पुष्ये वक्रतो नृपहानिदः।

यद्दिग्भ्योऽभ्युदितो भौमस्तद्दिग्भूपभयप्रदः ।।


यदि मंगल श्रवण नक्षत्र में उदित हो और पुण्यनक्षत्र में वक्री हो तो राजाओं को हानिप्रद होता है। तथा जिस दिशा में उदय होता है उस देश के राजा के लिए भय उत्पन्न करता है।


मखा मध्यगतो भौमस्तत्रैवं च प्रतीपगः ।

अवृष्टिशस्त्रभयदः पाण्डुदेशाधिपातकृत्।।


यदि मंगल मघा नक्षत्र के मध्य में उदय होकर मघा नक्षत्र में ही वक्री हो जाय तो अवृष्टि हो, शस्त्रभय हो तथा पाण्डु देश के राजा का मरण होता है।


पितृद्विदैवधातृणां भिद्यन्ते योगतारकाः ।

दुर्भिक्षं मरणं रोगं करोति यदि भूमिजः ।।


यदि मंगल मघा, विशाखा और रोहिणी से योगतारा विद्ध हो तो दुर्भिक्ष, मरण तथा रोग होता है।

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