Shubh muhurt vadhu Pravesh Ghar Mein. वधू प्रवेश शुभ मूहुर्त.
प्रिय पाठकों,
नमस्कार! इस लेख में आप जान पाएंगे कि विवाह के बाद दुल्हन का पुन: ससुराल में गृहप्रवेश के लिए दिन, तिथी तथा शुभ वार कब होता ? तथा उसका महत्व क्या है?
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि हिंदू धर्म में जन्म से लेकर और मृत्यु पर्यंत मुख्ता 16 प्रकार की संस्कार होते हैं तथा अप संस्कार भी कुछ होते हैं जो तिथि, वार, नक्षत्र के आधार पर मुख्य संस्कार को विधिवत्त संपन्न करने के लिए किये जाते है।
इसलिए आज मैं विवाह से संबंधित एक महत्वपूर्ण संस्कार के बारे में चर्चा करूंगा की जब विवाह विधिवत्त रूप से संपन्न हो जाता है तथा दुल्हन वापस एक दिन के पश्चात अपने पिता के घर में आ जाती है, और फिर तिथि, वार, नक्षत्र के आधार पर निर्णय लिया जाता है कि कब किस तिथि को, किस वार को या कितने दिन पश्चात दुल्हन पुनः अपने ससुराल में जाएगी तो यह एक उप संस्कार होता है और इसको आप वधू प्रवेश या पिता के घर से ससुराल में जाने की दिन को द्विरागमन या रस्म रिवाज के आधार पर प्रत्येक क्षेत्र में अलग-अलग नामों जाना जा सकता है। जो विधि है वह समान रूप से ही होती है।
द्विरागमन शब्द का अर्थ-
विवाह के बाद पति के घर जाना वधू प्रवेश है। उसके बाद पिता के घर से यात्रा का नाम द्विरागमन है।
समय
विवाह के दिन से 16 दिन के भीतर छठा, आठवां, दसवां या सम दिन जैसे 2- 4 इत्यादि दिनों मे वधू प्रवेश शुभदायक माना जाता है।
वधू प्रवेश मूहुर्त -
रेवती अश्विनी रोहिणी मिरगूसरा धनिष्ठा हस्त चित्रा स्वाती मूल माघ तीनों उत्तर पुष्य और अनुराधा इन नक्षत्रों में रिक्त वर्जित तिथि रवि और मंगल छोड़कर शेष दिनों से वधू प्रवेश शुभ माना जाता है।
द्विरागमन मास-
वैशाख में सौभाग्यवती तथा धन संयुक्ता होती है और अगहन में अधिकपुत्रों वाली, फाल्गुन में पतिप्रिया, बंधुवर्ग से प्रेम करने वाली और पुत्रवती होती है। इससे अन्य महीनों में दुरागमन होने से वन्ध्य, दुर्भगा, दरिद्रता, स्वामी से त्यक्ता, उद्वेगयुक्ता तथा स्वामी और पुत्र से बड़़े-बड़े कष्ट पानी वाली मानी जाती है।
द्विरागमन मुहूर्त -
मृदु, ध्रुव और चरसंज्ञक, मूल इन नक्षत्रों में यात्रा में कहे हुए तिथि तथा शुभ दिनों में, रवि और बृहस्पति के शुद्ध रहने पर शुक्ल पक्ष में द्विरागमन करना श्रेष्ठ माना गया है।
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लेख को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद!
पं. हेवती नन्दन कुकरेती, ज्योतिषाचार्य
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