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भावफल विचार

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  वैदिक ज्योतिष में प्रथम भाव (लग्न) का महत्व और 'भावफल विचार' लेखक: ज्योतिषाचार्य: पंडित हेमवती नन्दन कुकरेती  वैदिक ज्योतिष में जन्मकुंडली के बारह भावों में प्रथम भाव यानी लग्न को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है। यह भाव देह, आरोग्य, रूप, स्वभाव और जातक के संपूर्ण जीवन का आधार है। यदि लग्न बलवान हो, तो कुंडली के अनेक दोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं। लग्न भाव: समस्त सुखों और कर्मों का आश्रय जन्मकुंडली के सभी शुभाशुभ फलों का भोग शरीर के माध्यम से ही संभव है, इसीलिए प्रथम भाव को फलाश्रय एवं कर्माश्रय कहा जाता है। जिस प्रकार किसी टूटे या फूटे हुए बर्तन में पानी नहीं टिक सकता, उसी प्रकार लग्न के निर्बल होने पर कुंडली के बड़े-बड़े राजयोग और धनयोग भी अपना प्रभाव खो देते हैं। > भावा द्वादश तत्र सौख्यशरणं देहं मतं देहिनां, > तस्मादेव शुभाशुभाख्यफलजः कार्यों बुधैर्निर्णयः॥ >  अर्थ: बारह भावों में देह (शरीर) ही प्राणियों के समस्त सुखों का आश्रय है। इसलिए विद्वानों को शुभ और अशुभ फलों का निर्णय मुख्य रूप से लग्न और देह के बल का विचार करके ही करना चाहिए। शारीरिक सौख्य और आरोग्य...